Tuesday, October 11, 2022

ये औरतें

ये औरतें
ये औरतें
सच! गीली मिट्टी से
बनी होतीं हैं
जिस रूप में
चाहो ढल जातीं हैं
आँखों में आँसू और
जमाने भर का दर्द
अपने सीने में
लिये फिरती हैं
फिर भी ये
हँस कर जिया करती हैं
कभी पूरी नींद
नहीं सो पातीं
कभी भर पेट
नहीं वो खातीं
घर परिवार को हथेलियों में लिये
दिन रात जला करतीं हैं
जब खुद पर बन जाये तो
सीने में संघर्ष की
मशाल जला कर
ढेर से दायित्वों का
मुकाबला किया करतीं हैं
ये औरतें... ।

-रेणु चन्द्रा माथुर
(धूप के रंग काव्य संग्रह से)

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