Tuesday, October 11, 2022

कहाँ अकेली हूँ

कहाँ अकेली हूँ?
सभी हैं मेरे अपने
ज्यों महक हवाओं में
यादों के एलबम से
मेरे आस पास बैठे हैं।
हर पल जीवन के
संजोये रखती हूँ
हर याद माला में
मोती सा पिरोती हूँ।
कहाँ अकेली हूँ?
बिखरे हुए पलों को
फिर से समेटती हूँ
बीती हुई यादों को
फिर से सहेजती हूँ
हर पल के अलग
निराले से स्वाद हैं
मधुर अहसासों से
सराबोर हो जाती हूँ
कहाँ अकेली हूँ?
आँगन की तुलसी
मुझे सहलाती है
पिछवाड़े का नीम
झगड़ता रहता है।
बहुत बोलती हूँ
घर की दीवारों से
प्यार भरे लम्हों से 
छू कर मुस्कराती हूँ
कहाँ अकेली हूँ? 

-रेणु चन्द्रा माथुर
('धूप के रंग' काव्य संग्रह से)

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