Tuesday, October 11, 2022

आँधी जो चली

आँधी जो चली
बिखर गये ख़्वाब
उड़ते पत्ते 

-रेणु चन्द्रा माथुर

आँगन छायी

आँगन छायी 
अमावस की रात
मन उदास

-रेणु चन्द्रा माथुर

आँख का आँसू

आँख का आँसू
है दिल का खज़ाना
भेद बताये

-रेणु चन्द्रा माथुर

अलाव जला

अलाव जला
ठंडे हाथ सेंकती
काँपती रात

-रेणु चन्द्रा माथुर

अन्तर्मन की

अन्तर्मन की
कोई न जाने पीड़ा
दुख का बीड़ा

-रेणु चन्द्रा माथुर

अँधेरी रात

अँधेरी रात
सन्नाटों को चीरती
हवा बेख़ौफ

-रेणु चन्द्रा माथुर



कड़ुवा नीम

कडुवा नीम
तुमने सच कहा था
कि मैं कडुवा नीम हूँ।
तुम्हें मेरा साथ
रास नहीं आया था
काश! तुम
उस कडुवाहट
को भुला पाते
तो कई रोगों
की दवा पा लेते।
और पथिक बन
राह चलते
मेरी शीतल छाँव
में बैठ जाते।
ठंडी हवा खाकर
अपनी थकान मिटाते।
मेरी सूखी टहनियाँ भी
तुम्हारे साथ रहतीं तो-
तुम्हारी मलिनता
को दूर कर देती।
हाँ। मैं कडुवा नीम हूँ।

-रेणु चन्द्रा माथुर

ये औरतें

ये औरतें
ये औरतें
सच! गीली मिट्टी से
बनी होतीं हैं
जिस रूप में
चाहो ढल जातीं हैं
आँखों में आँसू और
जमाने भर का दर्द
अपने सीने में
लिये फिरती हैं
फिर भी ये
हँस कर जिया करती हैं
कभी पूरी नींद
नहीं सो पातीं
कभी भर पेट
नहीं वो खातीं
घर परिवार को हथेलियों में लिये
दिन रात जला करतीं हैं
जब खुद पर बन जाये तो
सीने में संघर्ष की
मशाल जला कर
ढेर से दायित्वों का
मुकाबला किया करतीं हैं
ये औरतें... ।

-रेणु चन्द्रा माथुर
(धूप के रंग काव्य संग्रह से)

कहाँ अकेली हूँ

कहाँ अकेली हूँ?
सभी हैं मेरे अपने
ज्यों महक हवाओं में
यादों के एलबम से
मेरे आस पास बैठे हैं।
हर पल जीवन के
संजोये रखती हूँ
हर याद माला में
मोती सा पिरोती हूँ।
कहाँ अकेली हूँ?
बिखरे हुए पलों को
फिर से समेटती हूँ
बीती हुई यादों को
फिर से सहेजती हूँ
हर पल के अलग
निराले से स्वाद हैं
मधुर अहसासों से
सराबोर हो जाती हूँ
कहाँ अकेली हूँ?
आँगन की तुलसी
मुझे सहलाती है
पिछवाड़े का नीम
झगड़ता रहता है।
बहुत बोलती हूँ
घर की दीवारों से
प्यार भरे लम्हों से 
छू कर मुस्कराती हूँ
कहाँ अकेली हूँ? 

-रेणु चन्द्रा माथुर
('धूप के रंग' काव्य संग्रह से)

Sunday, October 09, 2022

ये पहाड़ी औरतें

ये पहाड़ी औरतें
भोर के उजास में
लगा कर विश्वास की
माथे पर बिंदिया,
पहन कर नथनी
नाक में अभिमान की,
लपेट कर पल्लू
कमर में जोश का,
चल पड़तीं काम पर
अपनी ही धुन में,
ये पहाड़ी औरतें

पीठ पर ढ़ोकर
जीवन का बोझ
पहाड़ी ढलानों पर
चढ़ते-उतरते
बुनती हैं ख्वाब
कभी साथी की
याद में हुलसतीं
कभी विरही गीत
गुनगुनाती जातीं,
ये पहाड़ी औरतें

रात चाँदनी में नहा
चाँद से बातें करतीं
कभी उल्हाने देतीं
कभी पूछतीं पता
परदेसी पिया का,
ये पहाड़ी औरतें

सखी सहेली-सी
आशाएँ साथ लिये
हँसी-ठिठोली करतीं
रात के सूने पहर में 
देख पाँवों के ज़ख्म
कराह उठती हैं
ये पहाड़ी औरतें।

-रेणु चन्द्रा माथुर 
केलिफोर्निया

Wednesday, September 28, 2022

परिचय




नाम:      रेणु चन्द्रा माथुर



शिक्षा:   एम.एस.सी.(जूलोजी).बी.एड.

सम्प्रति:   स्वतन्त्र लेखन

मूल विधा : कविता  

अन्य विधाएँ:  कविता,लघुकथा,कहानी एवं हाइकु लेखन 

प्रकाशन:  1  धूप के रंग,( कविता संग्रह  )
            ( राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा स्वीकृत )

             2  छोटी सी आशा (लघुकथा संग्रह )

             3 चाहत का आकाश ( कविता संग्रह )

             4 शीशे की दीवार   (कहानी संग्रह )

             5 विश्वास की धूप   (कहानी संग्रह)

सम्मान:   1 अखिल भारतीय साहित्य परिषद,जयपुर(वर्ष 2015)में कविता पुरस्कृत ।

              2  कुमुद टिक्कु साहित्यिक संस्थान,स्पंदन,जयपुर,द्वारा(वर्ष 2016)में कहानी पुरस्कृत ।

              3 अ.भा.राष्ट्र समर्पण द्वारा (वर्ष 2017)में बाल कहानी पुरस्कृत  ।

             4 अ.भा. शब्द निष्ठा प्रतियोगिता द्वारा (वर्ष 2017)में लघुकथा पुरस्कृत ।

             5 मगसम द्वारा लाल बहादुर  शास्त्री सम्मान (वर्ष 2017)

 सम्पर्क सूत्र:   140,New Colony
                       M.I.Road, Paanch Batti,
                        Near Wall street Hotel.
                        Jaipur,Rajasthan.302001

     
  ई-मेल:               renusatish2003@yahoo.com

Thursday, September 22, 2022

आँख का आँसू

आँख का आँसू
है दिल का ख़ज़ाना 
भेद बताये  

-रेणु चन्द्रा माथुर

Wednesday, September 21, 2022

आँसू छलके

आँसू छलके
चोट लगी जब भी
माँ याद आयी

-रेणु चन्द्रा माथुर